राज ठाकरे उसी रहगुज़र पर चल पड़े हैं जिस पर कभी उनके चाचा बाल ठाकरे चला करते थे. महाराष्ट्र में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच राज ने पहचान पर आधारित अलगाववादी राजनीति का दांव खेला है. क्या हैं इसकी वजहें और क्या हो सकते हैं इसके नतीजे, बता रहे हैं अजित साही .
पिछले साल 27 दिसंबर को प्रहलाद सिंह की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. बिहार से मुंबई आए सिंह के लिए आठ साल के इंतजार के बाद आखिर वो दिन आ पहुंचा था जब उनका खुद की टैक्सी चलाने का सपना पूरा होने वाला था. टैक्सी खरीदकर वो सीधे सिद्धिविनायक मंदिर गए और गणपति से टैक्सी को सलामत रखने की प्रार्थना की. अच्छे भविष्य की कोमना के लिए उस शाम वो चार और मंदिरों में भी गए.
लेकिन सिंह की प्रार्थनाएं काम नहीं आई. पांच हफ्ते बाद ही तीन फरवरी को भीड़भाड़ वाली बांद्रा रोड पर जब वो एक सवारी लेकर जा रहे थे कि सरिया लहराते दर्जन भर गुंडों ने उनकी टैक्सी को रोक लिया. एक हमलावर चिल्लाया—‘भैया’(मुंबई में उत्तर भारतीयों के लिए आम संबोधन) और देखते ही देखते उन लोगों ने चमचमाती टैक्सी के शीशे और सिंह के सपने चकनाचूर कर दिए.
| नगर निगम चुनावों में उनकी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी और महाराष्ट्र की राजनीति में एमएनएस महत्वहीन हो गई थी. स्वाभाविक ही था कि कि वो कुछ ऐसा करते जिससे उन्हें सुर्खियां मिलें और फायदा भी. |
35 साल के सिंह परेशान से ज्यादा हैरान हैं. वो पूछते हैं, “मैंने मुंबई में आज तक किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया. फिर ये क्या हुआ?”
जवाब सीधा है. अरे भाई ये राजनीति है. नौ साल से राज्य की गद्दी पर काबिज कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन का भविष्य अगले साल होने वाले चुनावों में अनिश्चित नजर आ रहा है. 2009 में लोकसभा और विधानसभा, दोनों की लड़ाई है. उधर, सिर्फ एक बार सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सके शिवसेना-भाजपा गठबंधन को दोबारा ऐसा होने की उम्मीद नजर आने लगी है.
हर लिहाज़ से मुंबई की एक चौथाई उत्तर भारतीय आबादी के खिलाफ इस हफ्ते हुई हिंसा और कुछ नहीं बस सत्ता की दौड़ में आगे निकलने की जद्दोजहद भर है. और इसके केंद्र में हैं शिवसेना से नाता तोड़ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) बनाने वाले 39 वर्षीय राज ठाकरे. दो साल पहले चाचा बाल ठाकरे और भाई उद्धव ठाकरे से अपनी राह अलग करने के बाद राज का राजनीतिक सफर उतना चमकदार नहीं रहा जितना उन्होंने सोचा था. नगर निगम चुनावों में उनकी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी और महाराष्ट्र की राजनीति में एमएनएस महत्वहीन हो गई थी. स्वाभाविक ही था कि कि वो कुछ ऐसा करते जिससे उन्हें सुर्खियां मिलें और फायदा भी. इसलिए खुद को एमएनएस का कार्यकर्ता बताने वाले अराजक तत्वों ने इस हफ्ते खुलेआम मुंबई के टैक्सीवालों, छोटे दुकानदारों, रोजमर्रा के यात्रियों और यहां तक कि अमिताभ बच्चन के घर पर भी हमला किया.
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एमएनएस के उपाध्यक्ष वागीश सारस्वत तहलका से कहते हैं, “ये शर्म की बात है कि इतने दशकों से मुंबई में रहने के बाद भी उत्तर भारतीय न तो राज्य की संस्कृति को ही आत्मसात कर पाए हैं और न ही मराठी सीख सके हैं. आप रहते तो महाराष्ट्र में हैं और व्यवहार ऐसा करते हैं जैसे उत्तर प्रदेश में हों.”
मगर ये भी सच है कि अतिउत्साही मीडिया कवरेज के बावजूद हिंसा छिटपुट और सीमित ही रही और इसके होते रहने के बावजूद ज़्यादातर मुंबईवासियों की जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही.
विवाद के जोर पकड़ने और लालू यादव, मायावती और नीतिश कुमार जैसे उत्तर भारतीय नेताओं द्वारा राज ठाकरे को गिरफ्तार करने की मांग से ये आशंकाएं पैदा हो गई हैं कि कहीं इससे मुंबई और महाराष्ट्र के कुछ दूसरे हिस्सों में सामाजिक अलगाव का दूसरा चरण शुरू न हो जाए.
राज को इस कदम के लिए उकसाने वाली प्रमुख वजह रही शिवसेना द्वारा पिछले महीने उत्तर भारतीयों को लुभाने के लिए एक के बाद एक उठाए गए कई कदम. मुंबई और आसपास के उत्तर भारतीयों को पार्टी से जोड़ने के लिए चलाए गए इस अभियान की अगुवाई शिवसेना के उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे ने की. गौरतलब है कि राज ठाकरे ने 2005 में तब शिव सेना छोड़ दी थी जब बाल ठाकरे ने उन्हें दरकिनार कर अपने बेटे उद्धव को पार्टी की कमान सौंप दी थी. 47 वर्षीय उद्धव भले ही उम्र में राज से बड़े हों मगर उन्होंने राजनीति में कदम तब रखे थे जब राज को पार्टी के लिए काम करते 10 बरस बीत चुके थे. जनवरी के अंत में जब उद्धव ने यूपी दिवस की आड़ में उत्तर भारतीयों को लुभाने के लिए मुंबई में कई आयोजन किए तो पहले राज ने ऐसे आयोजनों के खिलाफ चेतावनी जारी की. फिर उन्होंने कर्मभूमि महाराष्ट्र के बजाय जन्मभूमि उत्तर प्रदेश को ज्यादा तरजीह देने के लिए सार्वजनिक रूप से अमिताभ बच्चन की आलोचना की. इसके तुरंत बाद हिंसा शुरू हो गई.
| राज ठाकरे ने 2005 में तब शिव सेना छोड़ दी थी जब बाल ठाकरे ने उन्हें दरकिनार कर अपने बेटे उद्धव को पार्टी की कमान सौंप दी थी. 47 वर्षीय उद्धव भले ही उम्र में राज से बड़े हों मगर उन्होंने राजनीति में कदम तब रखे थे जब राज को पार्टी के लिए काम करते 10 बरस बीत चुके थे. |
राजनीतिक टिप्पणीकार और मराठी दैनिक लोकमत के संपादक कुमार केतकर कहते हैं, “शिवसेना ये जानती है कि अगर उसे सत्ता में वापसी करनी है तो इसमें उत्तर भारतीय वोटों की अहम भूमिका होगी क्योंकि मुंबई की सभी 36 विधानसभा सीटों में मराठी अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं. उद्धव 2004 की गलती को दोहराने का जोखिम मोल नहीं ले सकते जब पार्टी ने सिर्फ मराठियों को लुभाने पर ध्यान केंद्रित किया था और बुरी तरह मुंह की खाई थी.”
शिव सेना नेता और पार्टी के अखबार दोपहर का सामना के संपादक प्रेम शुक्ला जोड़ते हैं, “राज को चिंता इस बात की है कि कहीं उद्धव सत्ता में न आ जाएं.” शुक्ला मानते हैं कि उत्तर भारतीयों और मराठियों के बीच बढ़ते तनाव से वोटों का ध्रुवीकरण होगा जिसका खामियाज़ा शिवसेना को उठाना होगा.
अमिताभ बच्चन को निशाना बनाकर राज ने चतुर दांव खेला है. इससे उन्हें राष्ट्रव्यापी सुर्खियां मिली और उत्तर प्रदेश से सांसद जया बच्चन ने उनके जाल में फंस कर बयान दे दिया कि वो तो बाल और उद्धव के अलावा किसी तीसरे ठाकरे को जानती ही नहीं. दरअसल सभी पार्टियों को पता है कि राज ठाकरे का ये दांव राज्य की राजनीति में उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है. शायद यही वजह है कि चारों मुख्य पार्टियों—कांग्रेस, राकांपा, बीजेपी और शिव सेना—में से किसी ने भी इस विवाद पर कुछ नहीं कहा. बाल और उद्धव ठाकरे की खामोशी तो सबसे गहरी है. वैसे उनकी दोनों स्थितियों में आलोचना होना तय है–अगर वो इसके पक्ष में कुछ कहें तो भी और अगर इस पर विरोध जताएं तब भी.
राजनीति से कोई वास्ता न रखने वाले फिल्म संगीतकार श्रीकांत ठाकरे की संतान राज ठाकरे को छोटी उम्र से ही राजनीति से लगाव हो गया था. पुराने लोग याद करते हैं कि छह साल का राज अपने चाचा बाल ठाकरे की राजनीतिक रैलियों में उनके साथ बैठा करता था और उनके गले में पड़ी फूलमालाओं से खेला करता था. अपने चाचा और भाई की तरह चित्रकारी में रुचि रखने वाले राज ने जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया और वहां के छात्र संघ के अध्यक्ष बने. शिवसेना के छात्र संगठन भारतीय विद्यार्थी सेना के उत्थान का श्रेय दरअसल राज को ही जाता है. बाल ठाकरे ने 1980 के दशक में इसकी कमान राज को सौंपी थी और शिवसेना का आतंक स्थापित करने में इस संगठन की एक अहम भूमिका रही है. धीरे-धीरे राज बाल ठाकरे के सबसे करीबी लोगों में से एक हो गए.
केतकर कहते हैं, “शिवसेना के भीतर भी राज के समर्पित अनुयायी हैं और ये मुमकिन है कि बाल ठाकरे का दौर बीत जाने के बाद बहुत से लोग राज के साथ जुड़ जाएं.”
वैसे एक तरह से देखा जाए तो राज ठाकरे महज उस रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं जो बाल ठाकरे ने तब अपनाया था जब 1966 में उन्होंने शिवसेना की स्थापना की थी. ठाकरे ने मुंबई में रहने वाले गुजरातियों और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ मराठी भावनाओं को उभारा और जल्द ही अखबार के एक कार्टूनिस्ट से ऐसे मशहूर नेता बन गए जिनसे लोग भय खाने लगे. मुंबई में मराठियों की अपेक्षा गैरमराठियों का ज्यादा प्रभुत्व रहा है. पिछली सदी के दौरान व्यापार में पारसियों और मराठियों का वर्चस्व रहा तो दफ्तरों में दक्षिण भारतीय काबिज रहे. उत्तर भारतीय मिल मजदूरों, छोटे व्यवसायियों, दूधवालों, मछली विक्रेताओं, ऑटो-टैक्सी और अखबार वालों के रूप में फैले तो मुसलमानों ने कबाड़ का धंधा जमाया.
| राज ठाकरे महज उस रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं जो बाल ठाकरे ने तब अपनाया था जब 1966 में उन्होंने शिवसेना की स्थापना की थी. ठाकरे ने मुंबई में रहने वाले गुजरातियों और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ मराठी भावनाओं को उभारा और जल्द एक कार्टूनिस्ट से मशहूर नेता बन गए |
ऐसे में ठाकरे ने मराठा हितों की बात की और अलगाववाद और हिंसा के जरिये अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की. इससे उन्हें भले ही राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना झेलनी पड़ी मगर महाराष्ट्र में 1960 के बाद वो मराठा अधिकारों की मजबूत जुबान के रूप में स्थापित हो गए. थोड़ी सी अवधि में शिवसेना के अराजक कार्यकर्ताओं ने वाममार्गी ट्रेड यूनियनों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी. वामपंथियों ने इल्जाम लगाया कि बाल ठाकरे और उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ जुड़ी व्यापार लॉबी के लिए काम कर रही है. अगले दो दशक में शिव सेना ने अलगाववादी राजनीति के सभी दांव खेले. पहले पीढियों से मुंबई में रह रहे गुजरातियों पर निशाना साधा. फिर दक्षिण और उत्तर भारतीयों को लपेटे मे लिया और आखिर में 1989 से 1993 के दौरान चले रामजन्मभूमि आंदोलन की आड़ में मुसलमानों पर हमलावर हुई.
कभी शिवसेना के प्रमुख नेता और पार्टी से सांसद रहे संजय निरुपम कहते हैं, “आम मराठा बांटने वाली इस राजनीति का समर्थन नहीं करता. यही वजह है कि पिछले 40 साल के दौरान शिवसेना कभी भी अपने दम पर सत्ता तक नहीं पहुंच पाई. बिहार और उत्तर प्रदेश में भले ही जाति के आधार पर बंटवारे की राजनीति चल जाती हो मुंबई में ऐसा मुमकिन नहीं हैं.” गौरतलब है कि 10 साल शिवसेना में बिताने के बाद निरूपम कांग्रेस में शामिल हो गए थे.
पिछले एक दशक के दौरान यूपी और बिहार से मुंबई आने वाले लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है. नतीजा ये हुआ कि शहर के लगभग पचपन लाख मराठियों की संख्या अब दूसरे समुदायों से कम रह गई है. विडंबना ये है कि इस का काफी कुछ श्रेय शिवसेना को ही जाता है. 1995 के विधानसभा चुनावों में विरोधी पार्टी के रूप में शिवसेना ने वादा किया था कि वो झुग्गी में रहने वालों को मुफ्त आवास मुहैया करायेगी. इससे ये हुआ कि उत्तर भारत से आकर मुंबई की झुग्गियों में बसने के लिए होड़ मच गई. सत्ता में आने के बाद पार्टी ये वादा भूल गई जो इसके 1999 का चुनाव हारने की एक वजह बना. लेकिन विस्थापन का जो ज्वार इस वादे से उमड़ा था वो बदस्तूर जारी है.
2004 के लोकसभा चुनावों में शिवसेना को मुंह की खानी पड़ी. कई दूसरे नेताओं के साथ इसके कद्दावर नेता और तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी शिवसेना का गढ़ कही जाने वाली उत्तर-मध्य मुंबई से अपनी सीट नहीं बचा पाए. गौरतलब है कि इसी इलाके में शिवसेना का मुख्यालय स्थित है. पार्टी की और बुरी गत तब हुई जब विधानसभा चुनावों में भी इसे हार का मुंह देखना पड़ा. उस समय मुंबई की 34 विधानसभा सीटों में से शिवसेना-बीजेपी गठबंधन महज 18 सीटें ही जीत सका.
इन झटकों के बाद शिवसेना को अपना नजरिया बदलने की जरूरत महसूस हुई. उद्धव ठाकरे ने अपने नारे ‘मी मराठी’ को बदलकर ‘मी मुंबईकर’ कर दिया. इसके बाद उन्होंने मुंबई के उत्तर भारतीयों को लुभाने के लिए अपना अभियान शुरू किया. योजना कामयाब रही और इसके बाद मुंबई नगरपालिका के लिए हुए चुनाव में पार्टी ने ज़बर्दस्त बाजी मार ली. गौरतलब है कि 12,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर के साथ ये भारत का सबसे धनी नगर निगम है. आज शिवसेना महाराष्ट्र के छह प्रमुख नगरनिगमों पर कब्जा है. पुणे नगरनिगम के चुनावों में शिवसेना ने बीजेपी को दरकिनार कर विरोधी राकांपा से गठबंधन किया और सत्ता हथियाने में कामयाबी हासिल की.
वरिष्ठ पत्रकार और शिवसेना के आलोचक रहे निखिल वागले कहते हैं, “40 साल पहले दुनिया अलग थी और बाल ठाकरे ध्रुवीकरण की राजनीति के सहारे सफल हो गए. आज वैश्वीकरण का दौर है. आज मेरे जैसे मराठी लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पूरी तरह से गैरमराठियों पर निर्भर हैं. राज ठाकरे की ध्रुवीकरण की कोशिश कामयाब नहीं होगी.”
| “40 साल पहले दुनिया अलग थी और बाल ठाकरे ध्रुवीकरण की राजनीति के सहारे सफल हो गए. आज वैश्वीकरण का दौर है. आज मेरे जैसे मराठी लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पूरी तरह से गैरमराठियों पर निर्भर हैं.” |
वैसे 2004 के चुनावों के बाद राज ठाकरे को भी ये बात समझ में आ गई थी कि गैरमराठी वोटों को अपनी तरफ मिलाये बिना उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं. जिस तरह से सीटों का पुनर्निधारण होने जा रहा है उससे राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से 64 मुंबई और उसके पड़ोसी जिले ठाणे में पड़ेगी जो शिवसेना का परंपरागत गढ़ रहा है.
विडंबना ये है कि राज ठाकरे ने भी जब अपनी पार्टी बनाई थी तो उनका एजेंडा धर्मनिरपेक्ष था. उनकी पार्टी के झंडे में दलित, मुस्लिम और हिंदू भावनाओं को दर्शाता नीला, हरा और भगवा रंग शामिल किया गया था. लेकिन पिछले साल महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में उनके सारे अरमान मिट्टी में मिल गए. जिस महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के बारे में बड़ी-बड़ी बातें की जा रही थीं उसका सफाया हो गया. 221 सीटों वाले बीएमसी में उन्हें मात्र छह सीटें ही मिल पाईं. राजनीतिक नैया मंझधार में डूबती देख राज को महसूस हुआ कि अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा है—शिवसेना का पारंपरिक गढ़ हथियाना. वो कुछ घटनाओं को गौर से भी देख रहे थे. जुलाई 2007 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने अपने सहयोगी बीजेपी को दरकिनार करते हुई कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल को समर्थन दिया था. एमएनएस के भीतरी सूत्रों की मानें तो पिछले महीने जब उद्धव ने नागपुर, अमरावती और पुणे में बड़ी किसान रैलियां करने में सफलता पाई तो राज को लगा कि जल्द कुछ किए जाने की जरूरत है. इन रैलियों में उद्धव ने गरीब किसानों के कर्ज माफ करने की मांग उठाई थी. ये एक ऐसा मुद्दा था जिसे अतीत में शिवसेना ने शायद ही कभी उठाया था.
उत्तर भारतीयों में सेना के बढ़ते प्रभाव से सिर्फ राज ही चिंतित नहीं थे. लंबे समय से मुंबई और आसपास के इलाकों के उत्तर भारतीयों के वोट पाते रहे कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को भी इसकी फिक्र हो रही थी. इस हफ्ते हुई हिंसा के बाद राज को गिरफ्तार करने में राज्य सरकार की नाकामी और मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख द्वारा इस घटना की कड़ी आलोचना न करने से आरोप लग रहे हैं कि अलगाववादी एजेंडे को हवा देने के लिए कांग्रेस भी राज के समर्थन में खड़ी है.
जैसा कि समाजवादी पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष अबू आजमी तहलका से कहते हैं, “जब राज ठाकरे के लोग उत्तर भारतीयों को पीट रहे थे तो पुलिस खड़े रहकर तमाशा देख रही थी. साफ है कि कांग्रेस और राकांपा राज के पीछे खड़ी हैं.”
सबूत के तौर पर आजमी उस घटना का हवाला देते हैं जिसमें इसी हफ्ते राज मुंबई पुलिस कमिश्नर डी एन जाधव की बेटी की शादी में शामिल हुए और खुशी से दमकते हुए जाधव ने राज की अगवानी की. शिव सेना के कार्यकर्ताओं का हमला झेल चुके वागले कहते हैं, “तत्काल भविष्य में संभावना ये बन सकती है कि राज (शिवसेना के खिलाफ) कांग्रेस के एजेंट के रूप में काम करने लगें.”
कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की एक और मुश्किल ये भी है कि समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव और उनके सहयोगी अमर सिंह महाराष्ट्र में अपनी ताकत बढ़ाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. इसी तरह बसपा सुप्रीमो मायावती पिछले नवंबर में मुंबई में एक विशाल रैली कर चुकी हैं. मुंबई में उन्होंने निचले स्तर पर पार्टी समितियों का गठन कर दिया है जिसमें सभी वर्गों के प्रतिनिधि शामिल हैं. इस तरह राज्य का राजनीतिक परिदृश्य जटिल होता जा रहा है.
| उत्तर भारतीयों में सेना के बढ़ते प्रभाव से सिर्फ राज ही चिंतित नहीं थे. लंबे समय से मुंबई और आसपास के इलाकों के उत्तर भारतीयों के वोट पाते रहे कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को भी इसकी फिक्र हो रही थी. |
हालांकि अगले चुनाव में इस बात की संभावना कम ही है कि मायावती या मुलायम कई सीट जीत पाएं लेकिन खतरा ये है कि वो दलित और उत्तर भारतीय वोटों में सेंध लगा सकते हैं जिसका फायदा अप्रत्यक्ष रूप से शिवसेना को होगा. इस तरह के परिदृश्य में कांग्रेस-राकांपा के लिए ये फायदे की ही बात होगी कि राज ठाकरे शिवसेना पर हमला करें और खुद को महाराष्ट्र के लोगों की असली आवाज बताते हुए शिवसेना के पारंपरिक वोट काट लें.
राजनीति जो भी हो मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा तूफान से उठे मुद्दे मुंबई के जटिल सामाजिक परिदृश्य में भी गूंज रहे हैं. मुंबई में एयरपोर्ट कर्मचारियों की एसोसिएशन के महासचिव 47 वर्षीय नितिन जाधव कहते हैं, “मैं कट्टर मराठी नहीं हूं और मेरे भाई और बहन की शादियां उत्तर भारतीयों से हुई हैं. लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि उत्तर भारतीय हमारी राजनीति हमारे वास्ते क्यों नहीं छोड़ देते.”
लोकप्रिय बॉलीवुड अभिनेता और राजनीति में कदम रख चुके गोविंदा दोनों पक्षों के बीच बेहतर संबंधों की अपील करते हैं. वो कहते हैं, “मुंबई भारत की जीवनरेखा है और भारत इसके साथ चलता है. अगर मुंबई को चोट पहुंचती है तो भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता.”
तमाम बातों के बावजूद एक बाद से सभी सहमत हैं कि मुंबई एक ऐसा बगीचा है जिसकी शोभा अलग-अलग रंगों के फूलों से बनती है. विडंबना देखिये कि खुद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उपाध्यक्ष वागीश सारस्वत की जड़ें उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हैं और वो टूटी-फूटी मराठी ही बोल पाते हैं. शिवसेना नेता और अखबार संपादक प्रेम शुक्ला भी गैरमराठी हैं. संजय निरूपम कहते हैं, “मेरी पत्नी मराठी हैं और मेरे बहुत से मराठी दोस्त हैं. इसलिए मैं कहता हूं कि मराठी और गैरमराठी की बहस में पड़ना ठीक नहीं. नहीं तो मुंबई की सारी टैक्सियां खड़ी हो जाएंगी.”
लेकिन निरूपम की ये बात भी सही नहीं. प्रहलाद सिंह ने अपनी टैक्सी खरीदने के लिए अपनी बीवी के गहने बेचे और भाई से पैसे उधार लिये और ये जब तक वो इन लोगों के लिए कुछ कर नहीं लेते वो टैक्सी खड़ी करने या वापस जाने का सोच भी नहीं सकते. सिंह कहते हैं, “मुंबई ने मुझे सब कुछ दिया है. मैं बिहार में जितना कमाता था उससे चार गुना ज्यादा यहां कमाता हूं. मैं आखिर वापस क्यों जाउंगा.”
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