विशिष्टता का सानिध्य

आनंदवन में बिताए जीवन और बाबा आमटे के साहचर्य के गुनगुनेपन को जितना हो सके समेटने की कोशिश कर रहे हैं डॉक्टर प्रकाश आमटे…

जब हम आनंदवन में रहने के लिए आए तब मेरी उम्र केवल तीन साल थी। इसके पहले का मुझे कुछ याद नहीं। तब ये एक जंगली इलाका था। ये सोचना भी काफी दिलचस्प है कि आनंदवन आज एक पर्यटन स्थल है क्योंकि उस समय तो कुष्ठ रोग के प्रति ऐसा पूर्वाग्रह था कि कोई हमारी तरफ देखना भी नहीं चाहता था। तब यहां कुल छह कुष्ठ रोगी थे जो एक झोपड़े में और हमारा परिवार दूसरे झोपड़े में रहा करता था। जब मेरा बड़ा भाई विकास पढ़ने के लिए वरोरा जाने लगा तो घर में मेरे साथ खेलने वाला कोई नहीं रहा और करने के लिए भी मेरे पास कुछ नहीं था। मैं हर सुबह उसे स्कूल ले जाने वाली बैलगाड़ी पर बैठने की जिद करता। एक साल तक मैं बिना दाखिला लिए ही स्कूल जाता रहा, यहां तक कि परीक्षा में भी बैठा। परीक्षा पास करने के बाद अगले साल मेरा दाखिला दूसरी कक्षा में विकास के साथ ही हो गया। इसके बाद हम दोनों मेडिकल कॉलेज तक एक साथ एक ही क्लास में पढ़े। बाबा कहते थे कि ये बड़ी अच्छी बात है कि उनके दोनों बेटे पढ़ने के लिए किताबों के एक ही सेट का उपयोग करते हैं। 

ताई के अलावा दादी ही शायद एकमात्र इंसान थीं जिन्होंने शुरुआत में बाबा का साथ दिया। वकालत छोड़कर कुष्ठ रोगियों के लिए काम करना, वो भी ऐसी जगह पर जहां तेंदुए दौड़ते हों, उनके तमाम भाई-बहनों को ये समझ नहीं आता था। 

बाबा और ताई हर रोज़ सुबह चार बजे उठ जाते थे। पूरी ज़मीन ऊसर और पथरीली थी लिहाजा उन्हें शून्य से शुरुआत करके सबकुछ खड़ा करना था। वो झोपड़ियां बनाते, गाय का दूध निकालते, पानी खींचते, खाना बनाते, साफ-सफाई करते और इस सबके अलावा रोगियों की देखभाल तो थी ही। एक भी पैसा भौतिक सुविधाओं पर खर्च नहीं किया गया। झोपड़ियों के भीतर गड्ढे खोदकर शौचालय बनाए गए थे। दशकों तक आनंदवन में कोई पंखा नहीं था। जब हम आनंदवन आए तो ताई बहुत ही संकोची स्वभाव की हुआ करती थीं। लेकिन, आनंदवन में साथ-साथ काम करते हुए उनके खुद के विचारों में भी परिपक्वता आई। किस तरह से किसी काम को अंजाम देना है उस पर वे अपने विचार तो रखती ही साथ ही जरूरत पड़ने पर बाबा से असहमति भी जता देती थीं। काम के चलते बाबा के पास अक्सर अपने बढ़े हुए परिवार के लिए ज़यादातर समय ही नहीं होता था। कभी-कभी जब वो नागपुर जाते थे तो हम बच्चों को भी अपने साथ ले जाते थे ताकि हम अपने दादी-दादा से मिल सकें। ताई के अलावा दादी ही शायद एकमात्र इंसान थीं जिन्होंने शुरुआत में बाबा का साथ दिया। वकालत छोड़कर कुष्ठ रोगियों के लिए काम करना, वो भी ऐसी जगह पर जहां तेंदुए दौड़ते हों, उनके तमाम भाई-बहनों को ये समझ नहीं आता था। निश्चित तौर पर आज कई दशकों के बाद हालात बदल चुके हैं। उनके काम को मिली दुनियाभर की मान्यता ने बाबा को अब एक मनमौजी भाई से एक जिम्मेदार और सम्माननीय व्यक्ति बना दिया है। 

बाबा एक स्वप्नदृष्टा थे। रूढ़िवादी मां-बाप की आठ संतानों में से एक, बाबा किस मिट्टी के बने थे? वो क्या थे? ये एक रहस्य है। जब मेरा भाई और मैं छोटे थे हम उनकी पसंद समझ ही नहीं पाते थे और अक्सर झुंझलाहट में रहते थे। हमें लगता है कि मां हमारे तमाम अभावों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नज़रिया रखा करती थीं। मुझे याद है कि एक बार हम वरोरा में देर तक रुके रह गए थे। घर पहुंचते ही हमारा सामना बाबा के गुस्से से हुआ, “तुम लोग टेबल टेनिस खेल रहे थे और बेचारा बैलगाड़ी वाला अंधेरे में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।वो हमसे अनुशासित जीवन जीने की उम्मीद रखते थे मगर साथ ही हमें एक अलग सोच वाला इंसान बनाने की भी कोशिश करते थे। जैसे-जैसे आनंदवन विकास कर रहा था बाबा से मिलने वालों की संख्या भी बढ़ रही थी। गरीब लोग, राजनेता, लेखक, कवि- हर तरह के लोग आते थे। विकास और मैं अपने बाबा के रूप में इस विशिष्ट व्यक्ति का बेहद नज़दीक से अध्ययन किया करते थे। उन दिनों हम किसी रेस्त्रां में जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। हम किस पिता के पुत्र हैं ये हमेशा हमारे दिमाग में रहता था और अगर हम कभी इसे भूल जाते तो लोग हमें इसका एहसास करा देते। सिबलिंग राइवलरी को जिस स्तर पर मैंने और विकास ने महसूस किया है शायद ही किसी ने किया होगा क्योंकि सैंकड़ो लोग हमारे माता-पिता को बाबा और ताई कहते थे। जब हम दोनों 16 और 17 साल के थे, हमें समझ में आने लगा कि बाबा बिना किसी प्रशिक्षण के बिना ही कुष्ठ रोगियों के लिए कितना कुछ हासिल कर चुके हैं। जब आनंद

कुष्ठ रोगियों द्वारा स्थापित एक महाविद्यालय स्वस्थ और सामान्य लोगों की ज़रूरतें पूरी कर रहा था। बाद में जब हम डॉक्टर बन गए तो सबसे ज्यादा खुशी बाबा को ही हुई इसलिए नहीं कि उनके बेटों ने ऐसा किया बल्कि इसलिए कि उस समय तक आनंदवन में कोई डॉक्टर ही नहीं था।

निकेतन कॉलेज की स्थापना हुई तो विकास और मैंने उसमें सबसे पहले अपना नामांकन करवाया। एक विशेष बात ये कि कुष्ठ रोगियों द्वारा स्थापित एक महाविद्यालय स्वस्थ और सामान्य लोगों की ज़रूरतें पूरी कर रहा था। बाद में जब हम डॉक्टर बन गए तो सबसे ज्यादा खुशी बाबा को ही हुई इसलिए नहीं कि उनके बेटों ने ऐसा किया बल्कि इसलिए कि उस समय तक आनंदवन में कोई डॉक्टर ही नहीं था। बड़े होने पर हमने सब कुछ बाबा के हिसाब से नहीं किया। हम अपने बच्चों के साथ शायद ज्यादा ही नरम रहे और इसके अलावा कुछ दूसरे कामों की भी शुरुआत की। लेकिन हम सबका मानना था कि बाबा का काम करने का तरीका बिलकुल दुरुस्त था। आनंदवन में काम करने वाला हर व्यक्ति, यहां तक कि बैलगाड़ी का कोचवान भी कुष्ठ रोगी था। बाबा का ये बयान थोड़ा विवादित रहा कि कुष्ठ के चलते अपने हाथ पैर गंवा देना ठीक है लेकिन अपना आत्म सम्मान गंवाना ठीक नहीं।

आज अगर ऐसा लगता है कि जिंदगी में आने वाले कैसे भी उतार-चढ़ाव विकास और मुझे झकझोर नहीं सकते तो ये सब बाबा के हमें पालने के तरीके से ही संभव हुआ है। हम उनकी मृत्यु के लिए भी तैयार थे। अपनी ज़िंदगी और काम से बाबा पूरी तरह संतुष्ट थे। जिन थोड़ी सी बातों का उन्हें मलाल रहा शायद उनमें से एक थी कि करगिल युद्ध के ठीक बाद वे पाकिस्तान की यात्रा पर नहीं जा सके। उन्हें पता था कि उनका समय समाप्त हो चुका है और शायद उन्होंने इसका स्वागत भी किया होगा। जिस तरह के सक्रिय व्यक्ति वो थे–तीक्ष्ण और स्पष्ट याददाश्त वाले–उनके लिए बिस्तर पर पड़े रहना और दूसरों पर निर्भर रहना बेहद दुखद था। रिश्तेदारों के लिए भले ही अपने किसी प्रिय की उम्र को लंबा करना अच्छी बात हो लेकिन हम जानते थे कि हम बाबा की पीड़ाओं को भी लंबा कर रहे थे। पिछले छह महीनों की तुलना में बाबा मृत्यु के पश्चात ज्यादा शांत नज़र आ रहे थे।

ताई अब बाबा के लिए विलाप कर रही हैं लेकिन मेरे ख्याल से उन्हें उतना ही आश्चर्य भी है। उनकी योजना अखण्ड सौभाग्यवती रहते हुए पहले मृत्यु का वरण करने की थी। यही एक रास्ता था जहां ताई और बाबा अलग-अलग थे। ताई धर्मभीरु थी बाबा बिल्कुल ऐसे नहीं थे। दुनिया को बदलने के लिए मानवता और युवाशक्ति में अटल विश्वास रखा करते थे।

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